Simple Meaning Ramayana Hindi Litairian

गोल्डन सनराइज दोस्तों।।

आज मैं आपके सभी के साथ एक अत्यंत ज्ञानवर्धक लेख सांझा कर रहा हूँ।

यह लेख मेरे हृदय प्रिय मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम प्रभु के पावन चरित्र मे गूढ़ ज्ञान के पहलू को दर्शाता है। साथ ही मैं आपसे एक विचार भी सांझा करना चाहता हूँ। कहा जाता है कि धर्म और विज्ञान का मेल नहीं है या कुछ तो यहाँ तक कहते हैं कि दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। किन्तु मेरा मत यह है कि धर्म और विज्ञान दोनो एक दूसरे के परस्पर सहयोगी हैं और परम् आनंद की यात्रा के वाहन भी हैं।

आशा है आप इस लेख को पढ़ने के बाद अपने विवेक से चिंतन करके विचार दर्ज करें ताकि मेरे विचारों को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त हो और भविष्य मे और गहन विषयों पर लिख सकूँ।

लेख प्रारम्भ करते हैं जिसमें द्रश्य यह है कि प्रभु राम माता सीता के साथ अयोध्या वापिस आ चुके है और उनका राज्याभिषेक भी हो गया है। एक दिन उपवन विहार करते समय माता सीता प्रभु राम से कहती है “नाथ आज मुझे अपना तत्व ज्ञान दीजिए”।

प्रभु राम मुस्कराये और कहने लगते हैं…

  • “सत्त, चित, और आनन्द रूपी एक महान सागर है उससे एक बिन्दु निकला जिसका नाम हुआ आत्मा, बुद्धि हुई उसकी माता, सत्वमय अन्त:करण पिता हुआ और तूरिय अवस्था, जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था, तथा सुसूप्ती अवस्था ये चारों भाई हुए। ह्रदयाकाश इनका निवास है और मनोवेग से यह कभी कभी बाहर भी आ जाती है किन्तु मन की गति का खण्डन करना होता है।
  • माया के योग से पूर्व संस्कारों का दमन करते है परन्तु कभी कभी बुद्धि भ्रमित हुई तो आत्मा को भटकना पड़ता है।फिर पन्चभुतात्मक अवस्था को स्थिर करके, भ्रम का निग्रह करके ही आत्मा को संतुष्टि मिलती है। यह आत्मा ऐसी कुटि है जहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह नही घुसते है। वहाँ शुद्ध सात्विकी माया का आश्रय होता है। रजोगुणी माया जठराग्णि में रहती है। तमोगुण का वियोग हो जाता है। सुख नही सिर्फ दुख की घटाएं घिरी रहती है।
  • इसके आगे शोकभंग का दर्जा आता जहाँ विवेक और भक्ति का जन्म होता है फिर प्राणी मद, काम, अंहकार आदि दुष्टों को मारकर आनन्द से रहने लगता है। अब यहाँ उसके लिए सत्त, चित व आनंद सदैव विराजमान रहते है और प्राणी कल्याण सागर में रहने लगता है इसे ही मुक्ति कहते है।”

ऐसा कहकर प्रभु राम कहने लगे हे सीता अब तुम चिंतन करके मुझे बतलाओ इस रहस्य का मूल तत्व क्या तुम्हें समझ आया???

तब माता सीता कहती है… 

  • “प्रकृति परमात्मा ही सागर है तरंग रूपी बूँद आत्मारूप ही राम है। बुद्धि माता कौसल्या, सत्त पिता दसरथ है। चार भाई तूरियावस्था राम बडे और लक्ष्मण भरत शत्रुघन छोटे है। ह्रदयाकाश स्थान अयोध्या है। मनोवेग से दूर होना विश्वामित्र के साथ यज्ञ जाना। मनोवेग भंग करना ही जनकपुर में धनुषभंग है। मन की दूर्व्रति का नाश ताडका वध है।
  • सीता विवाह ही माया योग है। परशुराम का दर्भभंजन ही पूर्व संस्कार निग्रह है। दूर्बुध्दि कैकई के कारण ही दण्डकारण्य में भटकना पड़ता है। काम-क्रोध का नाश खरदूषण वध है। आशा का नाश सूर्पनखा का विरूप करना है। मारिच म्रग वध ही मोहनाश है। आपके वाम भाग रहना सत्वगुण माया आश्रय। रजोगुणी रूप मेरा अग्नि प्रवेश ही तामसी वियोग और तामसी रावण के द्वारा हरण ही सुख अभाव है।
  • सुग्रिव की मित्रता का आश्रय, हनुमान का मिलना भक्ति और बालि का वध अज्ञान का वध है। सेतुबंध ही अज्ञान से तरने का उपाय और विभिषण का मिलना उत्साह है। मेघनाथ, रावण और कुम्भकरण का वध ही लोभ, मत्सर तथा अहंकार व आलस्य का नाश है। सात्विकी माया ही मेरा पुनग्रहण है। इसके बाद ह्रदयाकाश के कल्याण सागर में मिलना ही अयोध्या को बैकुंठ में मिला देना और आत्मा का परमात्मा प्रकृति मिलन है।

ऐसा कहते हुए माता सीता ने प्रभु राम को प्रणाम किया।

इस सुंदर वर्णन से स्पष्ट होता है कैसे हम सभी अपने जीवन मे बुद्धि, विवेक, ज्ञान, और भक्ति से अपनी इन्द्रियों का सदुपयोग कर सकते हैं तथा अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह को त्यागकर अपने जीवन को सदैव सुखमय बना सकते हैं। जब व्यक्ति तत्व को जान लेता है और इस पाँच तत्वों से बने शरीर के प्रयोजन को जानकर चेतना से जीवन यापन करता है तो वह सदा ही आत्मा और परमात्मा के आनंद के समुन्द्र स्थित रहता है।

हमारे गुरु ‘शरत सर’ ने हमें जो VK के रूप मे दिव्य उपहार दिया है इसके सहारे हम सभी अपने को इतना सुखद और आनंदमय बना सकते हैं।

  • VK हमें पूरी स्वतंत्रता प्रदान करता है ताकि हम इस जन्म मे अपने कर्मो और विचारों को सकारात्मक दिशा दे सकें।
  • VK की दिव्य ऊर्जाओं की सहायता से हम अपने प्रारब्ध और पूर्व जन्म संस्कारों के दुष्प्रभाव को भी समाप्त कर सकते हैं।
  • VK से लाभ लेकर आप अपने जीवन को परिवर्तित ही नहीं वरन दूसरों की, जानवरों की भी सहायता कर सकते हैं।
  • VK के साथ निरंतर प्रयास और ध्यान साधना करके आप परम् चेतना और परामानसिक शक्तियां जाग्रत कर सकते हैं।
  • VK से कुंडलिनी जागरण ध्यान, क्रिया योगा ऊर्जा, त्राटक ध्यान, शरत सर की मौन साधना, आदि की ऊर्जा को साधारण प्रार्थना करते हुए हम ध्यान की गहराईयों मे जा सकते हैं।

तो आइए हम सभी VK की दिव्य शक्तियों को ज्यादा से ज्यादा उपयोग करके अपने जीवन को धन्य करें।

4 COMMENTS

  1. Thanks Sir for providing so Simple, Spiritual and Deep Meaning of Ramayana in Hindi…Infinite Divine sunrises to you and readers of this article whose Sun also will rise by reading these beautifully Scripts.

  2. @Puneet

    Bahut Badiya Lekh hai.

    Aapne Ramayan, Conciousness ke states aur VK ko bade acche se jod diya hai.

    Dhanyawad !!

    GOLDEN SUNRISE

    • आपका बहुत बहुत धन्यवाद दीदी की आपने इस लेख को पढ़ने के लिए समय दिया और प्रतिक्रिया में आपका आशीर्वाद मुझे प्राप्त हुआ।
      शरत सर के सानिंध्य मे और VK के साथ साथ मुझे अनुभव प्राप्त हो रहे हैं कि वेदों, पुराणों, रामायण, और गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों मे हमें ज्ञान और विज्ञान के रहस्य ही समझाय गए हैं।
      यह समस्त उत्तपत्ति और संसार ऊर्जा का ही कार्यक्षेत्र है।

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