ध्यान योग और भ्रांतियाँ

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बीते कुछ सालों मे ध्यान और योग को लेकर जितने भ्रम और तर्क सब ओर फैला दिया गया है उसका ध्यान के ज्ञान और विज्ञानं दोनों से ही कोई सरोकार नहीं है।

कुछ लोगो ने इतना व्यापारीकरण तक कर डाला है कि बड़े बड़े शिविर और पंडालो का आयोजन किया जा रहा है। ऐसे ऐसे लुभावने कहानी किस्से लोगो के मस्तिष्क मे डाल दिए जा रहे कि लोग भी अपना कीमती समय और धन दोनों ही लुटाए जाते है।

इस सबसे जिनकी दुकानदारी चमक रही है उसके विपरीत किसी व्यक्ति विशेष को कोई लाभ होते मे देखा सुना नहीं है। यही नहीं लोग चमत्कारों के और शक्तियों के लुभावने सपनों के ऐसे आदी होते जाते की फिर उनका सामाजिक और पारिवारिक जीवन भी नरक होने लगता है।

दोस्तों ध्यान योग को लेकर फैलायी गयी ऐसे ही भ्रांतिया, चमत्कारिक दुनिया की बाते और विधियों से आपको अवगत कराने के लिए कुछ जानकारी आपके प्रत्यक्ष कर रहा हूं।

सर्वप्रथम तो आप ध्यान के बारे मे यह जान लीजिये कि यह कोई क्रिया नहीं है जिसको किसी विधि से, विशेष अवस्था मे आसन से, किसी विशेष पुजा सामग्री जैसे आयोजन से प्राप्त किया जा सकता है। स्वयं मे अक्रिया की अवस्था मे हो जाना ही ध्यान है, हमारा मस्तिष्क जो प्रतिपल हज़ारो विचारो से गुजरता रहता है और किसी बन्दर की तरह खुद से खुद ही बाते करने लगता है। इस क्रिया को अक्रिया मे परिवर्तित कर देना ही ध्यान है।

दोस्तों यह सारी सृष्टि सारा ब्रह्माण्ड कुछ नियम के अनुसार कार्य करता है। आप किसी भी तत्व या पदार्थ को देखें, सभी अपने विशेष स्वभाव, गुण और नियम अनुसार अपने अपने ऊर्जा क्षेत्र मे कार्य करते है। इसी प्रकार हमारा मन मस्तिष्क और चेतना भी अपने एक सीमित दायरे व् नियम अनुसार कार्य करते है। ऐसी कोई भी विधि, योग या आसन नहीं है जिसके द्वारा आप विचार बंद कर सके और ऐसा प्रयास करना भी निरर्थक है।

मस्तिष्क को अपनी चेतना से एक विशेष कार्य दे देना ही आपको ध्यान की अवस्था तक पहुचा देता है और धीरे-धीरे आप परम शांति, परम सत्य के गहरे आनंद मे डूबते जाते और फिर स्वयं एक दिव्य प्रेम की प्रतिमूर्ति होते जाते हैं।

यह परम आनंद, दिव्य प्रेम आपके साथ-साथ समूचे संसार का कल्याण स्वतः ही करने लग जाता है। यही इस मानव जीवन का परम उद्देश्य भी है।

इसके विपरीत ध्यान द्वारा शक्तियां प्राप्त करके, अपनी विशेष वासनाओं को पूरा करने का जो स्वप्न आपका पोषित किया जा रहा है वह कतई भी आपके लिए कल्याणकारी नहीं है।

हर विशेष शक्ति का अपना दायरा होता है। उसे भी नियम के अंतर्गत ही कार्य करना होता है, और फिर आप एक भंवर से निकलकर दूसरे गहरे भंवर मे जा फसते हैं।

इसलिए ध्यान की चिंता छोड़िये स्वतः ही ध्यान हो जाइये, अपने परिवार की जिम्मेदारी को पूरा कीजिये, प्रेम कीजिये और अपने वातावरण को दिव्य प्रेम के बीज़ से पोषित कीजिये।

अपने प्रत्येक कार्य को पूरी चेतना और समग्रता से निभाइये। मन कि गति को इतना धीमा कर दीजिए जैसे आप कोई चलचित्र देख रहे है और प्रत्येक दृश्य के आप साक्षी है।

कोई विशेष आयोजन करने की कही विशेष स्थान पर जाने की आपको आवश्यकता नहीं घर मे, बीच बाजार मे, खाना खाते, सोते जागते, अपने दैनिक कार्य करते हुए अपने मस्तिष्क को आती-जाती श्वास का साक्षी होने का कार्य दे दीजिए, फिर देखिए स्वतः ही आपके जीवन मे, चित मे, वातावरण मे ध्यान का आनंद गहराता जाएगा।

आशा करता हूं कुछ भ्रम दूर कर इस दुनिया को हम मिलकर एक बेहतर दुनिया बना पाएंगे ।।।

1 COMMENT

  1. GOLDEN SUNRISE Puneet.
    Thanks for writing this article. Very well explained. Dhyan ki chinta chodiye. ….aap shwatah hi Dhyan Ho jayiye.
    Ye aaj ke aadhunik jeevan shaili mei hum aksar bhool jate hain.
    Sukriya Dhanyawad Thank you.

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